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परिचय:

हिंदी कविता की वाचिक परंपरा में यदि हम नई पीढी के कवियों की बात करें तो सौरभ सुमन का नाम सबसे पहले स्मरण में आता हैं. बहुत कम उम्र से कवि-सम्मेलनों में काव्य-पाठ करते-करते आज मंचों के उन गिने-चुने नामो में सौरभ सुमन शुमार करने लगे हैं जिनकी आवश्यकता कार्यक्रम को ऊँचाइयों तक ले जाने के लिए जरुरी हो गई हैं.
बहुत ही कम उम्र में मंचो की बागडौर अपने हाथों में उन्होंने संभाली. जहाँ देश की पीड़ा को दर्शाने वाली उनकी कवितायेँ आक्रोश के तेवर को झलकाती हैं वहीँ उनके सञ्चालन में हास्य की फुलझड़ियाँ श्रोताओं को पूरी-पूरी रात ठहाके लगाने के लिए विवश कर देती हैं. सौरभ सुमन के सञ्चालन में पढने वाले किसी भी कवि को कभी ऐसा महसूस नहीं देता की उसकी भूमिका कमज़ोर रही हो. अपितु देश के तमाम कवि ये जानते हैं की सौरभ सुमन के हाथों में यदि मंच का सञ्चालन हो तो अपनी पूरी ऊर्जा वो मंच को ज़माने में लगा देते हैं. बहुत ही कम आयु में देश भर के बड़े कवियों का उन्हें प्रेम मिला हैं.
सौरभ सुमन का जन्म हिन्दुस्तान के प्रथम क्रांति-युद्ध की चिंगारी को जन्म देने वाली क्रांति-धरा मेरठ में हुआ. सुमन के पिता श्री अशोक जैन तथा उनकी माता जी श्रीमती सरिता जैन हैं. माँ के दिए संस्कार ही कहीं सुमन को ये दिशा दे सके. आरंभ से ही धर्म के प्रति उनकी रूचि विशेष रही. संतों का सानिध्य, विद्वानों का ज्ञान शुरू से ही सुमन को मिला.
सौरभ सुमन की आरंभिक शिक्षा उस समय में मेरठ के ख्याति-लब्ध विद्यालय St. John's School में हुई. बाद में हिंदी के प्रति उनकी रूचि और अंग्रेजी से विमुखता को देख कर उन्हें हिंदी विद्यालय C.A.B. Inter College. Meerut में डाला गया. B.Com. उन्होंने D.N. College Meerut से किया. साथ ही साथ कंप्यूटर की शिक्षा ले कर प्रिंटिंग-डीजयिनिंग का व्यापार आरम्भ किया.
सन 2000 में पहला कवि-सम्मलेन उन्होंने जैन मुनि उपाध्याय श्री ज्ञान सागर जी महाराज के सानिध्य में सूर्यनगर (गाजियाबाद) में पढ़ा. तब तक सौरभ केवल सौरभ थे. सौरभ को "सौरभ सुमन" नाम मुनि वैराग्य सागर जी ने प्रदत्त किया. धीरे-धीरे सौरभ हिंदी काव्य-मंचो की जरुरत बन गए.

शिक्षा: B.Com.

व्यवसाय: Graphic Designing & Printing Work.

कविता के क्षेत्र में उपलब्धियां:

* सा.सां.क.सं.अकादमी उत्तर प्रदेश द्वारा "विद्या-वाचस्पति" की मानद उपाधि.
* भारत के पूर्व-उप प्रधानमंत्री श्री लाल कृष्ण आडवानी द्वारा काव्य-सम्मान.
* भारत विकास परिषद् द्वारा विशेष काव्य-सम्मान.
* राष्ट्रीय हिंदी परिषद् द्वारा "हिंदी-गौरव" उपाधि से अलंकृत.
* संस्कार भारती द्वारा "व्यंग्य-भारती" सम्मान.
* जैन समाज द्वारा "जैन काव्य-श्री" "काव्य-रत्न" प्रदत्त.
* सरधना समाज द्वारा तीर्थंकर पद्म-प्रभु काव्य-सम्मान
* जैन मिलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उपन्यासकार "सुरेश जैन ऋतुराज" द्वारा "काव्य-भूषण".
* अखिल भारतीय कवि-सम्मेलनों का सफलतम संयोजन, सञ्चालन एवं काव्य-पाठ.
* अनेक टीवी चैनलों से काव्य-पाठ प्रसारित.
* कविताओ की दो ऑडियो सी.डी. क्रमशः "वीरस्य-भूषणम्" एवं "अनुसार" बाज़ार में उपलब्ध.

Friday, August 29, 2008

सुभाष चन्द्र बोस

घोर अंधियार हैं उजास मांगता हैं देश

पतझर छाया मधुमास मांगता हैं देश

कुर्बानियों का अहसास मांगता हैं देश

एक बार फिर से सुभाष मांगता हैं देश


चंद काले पन्ने फाड़े गए हैं किताब से

इतिहास को सजाया खादी ओ गुलाब से

पूछता हूँ क्यों सुभाष का कोई पता नहीं

कैसे कहूँ बीती सत्ता की कोई खता नहीं

एकाएक वो सुभाष जाने कहाँ खो गए

और सरे कर्णधार मीठी नींद सो गए

मानो या न मानो फर्क हैं साजिश ओ भूल में

कोई षड़यंत्र छुपा हैं समय की धूल में


गाँधी का अहिंसा मन्त्र रोता चला जा रहा

देखिये ये लोकतंत्र सोता चला जा रहा

आजादी की आत्म-हत्या पे क्यों सभी मौन हैं

इसकी खुद-कशी के जिम्मेदार कौन-कौन हैं

अभी श्वेत खादी की ये आंधी नहीं चाहिए

दस-बीस साल अभी गाँधी नहीं चाहिए

खोये हुए शेर की तलाश मांगता हैं देश

एक बार फिर से सुभाष मांगता हैं देश


नोटों की गड्डियाँ उछाले जाने पर मंदिर जैसी संसद के अपमान के विरुद्ध...

संसद की अस्मिता की ऐसे उठी डोलियाँ

कोठे पे तवायफों की जैसे लगे बोलियाँ

रोते रहे गाँधी उस नोट पे जड़े हुए

संसद की देहरी पे दोषी से खड़े हुए

लोकतंत्र की कराहें आंसुओं के घुल गई

संविधान की ऋचाएं गड्डियों में तुल गई

संसद का स्वाभिमान तार-तार कर दिया

संविधान द्रोपदी सा शर्मसार कर दिया

.

नेता जी पास होता तख्त हिन्दुस्तान का

विश्व देखता जूनून सख्त हिन्दुस्तान का

मुल्क का विधान बेजुबान नहीं होता यूँ

बैसाखी पे आज हिन्दुस्तान नहीं होता यूँ

फैसला वहीँ पे होता संसद की आहों का

वहीँ पे हिसाब होता सबके गुनाहों का

ऐसे लोकशाहों का विनाश मांगता हैं देश

एक बार फिर से सुभाष मांगता हैं देश


दे दी हमे आजादी बिना खडग बिना ढाल....साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.....ये गीत उन तमाम क्रांतिकारियों के बलिदान को तमाचा हैं जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति माँ भारती को आजाद करने में दे दी...तब कलम कहती हैं.....


ढाल ओ खडग बिन गाथा को गढा गया

आजादी का स्वर्ण ताज खादी से मढा गया

लालकिले में लगादी कियारियां गुलाब की

तारे जाके बैठे हैं जगह पे आफ़ताब की

आजादी की नींव को लहू से था भरा गया

मिली नहीं भीख में आजादी को वरा गया

कितने जांबाज बाज धरती में गड गए

किन्तु सरे श्रेय को लेके कपोत उड़ गए


जिन्हें परवाह नहीं थी किसी अनुरोध की

बेवा सिंहनी की पीठ पे बंधे अबोध की

काला-पानी जेल की दीवारें चीखती रहीं

सावरकर के जख्म की दरारें चीखती रहीं

जिनके बहीखाते कटी गर्दनों से भर गए

कहते हो आप के वो चरखे से डर गए

अब सही सही इतिहास मांगता हैं देश

एक बार फिर से सुभाष मांगता हैं देश


आजादी के समय ब्रिटिश हुकूमत के गवर्नर लोर्ड माउन्ट बेटन और नेहरु जी के बीच एक अनुबंध हुआ जिसमे नेता जी को "युद्ध-अपराधी" घोषित कर जिन्दा या मुर्दा अंग्रेजो को सौंपने की शर्त रखी गई...तब कहता हूँ....


ऐसे अनुबंध छिपे कागजों की पर्त में

जिनमे सुभाष बिके आजादी की शर्त में

मौन दस्तावेजों की वो स्याही चीखती रही

उन्हें पास आती मात्र सत्ता दीखती रही

नींव की जो शख्स ईंट बुनियादी हो गया

आजादी मिली तो युद्ध अपराधी हो गया

जिसके मुकाबले में आसमान बोना था

अपराधी हुआ जिसे राष्ट्र-पिता होने था


अनुबंध के वो प्रष्ठ फाड़े जाने थे तभी

आँखों में गोरो के पेन गाडे जाने थे तभी

बोला होता बेटन से नेहरु जी ने डांट कर

देखा जो सुभाष को तो रख देंगे काट कर

शर्म से वो कागज़ भी आंख मीचता रहा

किन्तु उन्हें दिल्ली वाला तख्त खींचता रहा

ऐसे शासकों का वन-वास मांगता हैं देश

एक बार फिर से सुभाष मांगता हैं देश


545 सांसद मिलकर एक देश को एक करार के लिए सहमत नहीं कर पा रहे हैं....वहां गुलाम देश के एक गुलाम भारतीय ने तीन-तीन मुल्कों के राष्ट्राध्यक्षों को ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध युद्ध के लिए तयार किया था.....सोचिये यदि आज सत्ता बोस जैसे किसी नेता के हाथ में होती तो हमारी स्थिति क्या रही होती......


माँगा नहीं दिल्ली वाला राज भी सुभाष ने

चाहा नहीं मोतियों का ताज भी सुभाष ने

नेता जी का सपना था बेडियों को तोड़ना

भारत के नाम को स्वाधीनता से जोड़ना

भारती के आंसुओं से आँख जिसकी खारी थी

माँ की हर चोट जिसकी आत्मा पे भरी थी

बोस एक नाम हैं अंधेरों में चराग का

गुलामी के आंसुओं में दबी हुई आग का


1945 में एक विमान दुर्घटना में नेता जी को मृत घोषित किया गया. 1947 को हुए अनुबंध में फिर ये शर्त क्यों रखी गई की नेता जी भारत आते हैं तो उन्हें अंग्रेजी हुकूमत को सौंपना होगा.....इसका आशय यही हैं की अंग्रेज भी जानते थे की नेता जी जीवित हैं और हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु जी भी जानते थे की सुभाष जिन्दा हैं.....फिर ये विमान दुर्घटना का झूठ क्यों...???


कहते हो बैठे थे सुभाष जिस विमान में

हो गया हैं ध्वस्त वो विमान ताइवान में

सूर्य के समक्ष वक्ष तान घटा छा गई

भाग्य की कलम स्याही से कहर ढा गई

दिव्य क्रांति-ज्योत को अँधेरा आके छल गया

बोलते हो सूर्य-पुत्र चिंगारी से जल गया

आपसे वो जली हुई लाश मांगता हैं देश

एक बार फिर से सुभाष मांगता हैं देश

14 comments:

रश्मि प्रभा said...

घोर अंधियार हैं उजास मांगता हैं देश

पतझर छाया मधुमास मांगता हैं देश

कुर्बानियों का अहसास मांगता हैं देश

एक बार फिर से सुभाष मांगता हैं देश
............बहुत जीवंत आह्वान........

RAJEEV said...

hi! dear Saurabh Bhaiya,

it's not only good, best of the best.


rajeev kumar

brijendra said...

i m quit impressed with these poems
aaj ke yug ki jarrorat ek nahi aneko subhash hain

Nishant said...

To Organize A Hit Kavi-Sammelan

पूरी तरह से व्यवसायी हो गए हैं लगता, और ये क्या आप बता रहे हैं,,सुभाष और संसद के बारे में,,इनसे हम भी अवगत हैं,,अगर माहौल को तुकांत में बांधना ही कविता है,,तो सभी को कवि हो जाना चाहिये,,मगर भूकंप में गिरे घर को गरीब संभालता है,,और आपकी कविता के लिए नया विषय बन जाता है..शर्म खाइए सौरभ जी,,पूरा तमाशा कर दिया है साहित्य का,
कुछ करना है तो जाकर करिए,, ये कागजों को मत बर्बाद कीजिये,,
निशांत कौशिक,,
kaushiknishant2@gmail.com

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर और जीवंत रचना है।बधाई....

tarun said...

अति उत्तम !!!!!!!!

kuchmadi kavi said...

यूँ ना सब पर उँगलियाँ उठाया करो...
उठाने से पहले खुद कमाया करो...!!

आपके अनुसार हल्दीदीघाटी, बुंदेलो हरबोलो के मुंह भी कविता नही है...!!

Rahul Indriya said...

बहुत ही सुन्दर रोंगटे खड़े कर देने वाली अमर कविता ...

Rahul Indriya said...

बहुत ही सुन्दर रोंगटे खड़े कर देने वाली अमर कविता ...

Arpan Mishra said...

सच्चाई को उजागर करती है आपकी कविता और सोचने पर मजबूर करती है बहुत खूब भाई जी

Arpan Mishra said...

सच्चाई को उजागर करती है आपकी कविता और सोचने पर मजबूर करती है बहुत खूब भाई जी

Arpan Mishra said...

सच्चाई को उजागर करती है आपकी कविता और सोचने पर मजबूर करती है बहुत खूब भाई जी

Arpan Mishra said...

सच्चाई को उजागर करती है आपकी कविता और सोचने पर मजबूर करती है बहुत खूब भाई जी

lata sanwal said...

Bahut hi sundar... Jis bat ko sayad aaj hum bhul gye h...aapne use jivant kr diya sir...!!