मकबूल फ़िदा हुसैन द्वारा माँ भारती के नग्न चित्र बनाने के विरुद्ध:
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यदि हम मुहोम्मद साहब के कार्टून बनाने पर विरोध कर सकते हैं तो क्या हमे माँ भारती के नग्न चित्र बनाने का विरोध नही करना चाहिऐ? जो लोग इन दोनों घटनाओ को अलग-अलग नज़रों से देखते हैं उनके लिए मैंने ये कविता लिखी-
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फिर क्यो फिजा मे विषधारी महावात है।
बुझे-बुझे हैं चिराग अंधियारी रात है।
आंखो का ये श्याम रंग ज्वाल लाल हो गया।
भ्रकुटियाँ तनी काल विकराल हो गया।
शांत जलधि मे जैसे ज्वार आ गया।
काले घन आये अन्धकार छा गया।
कोकिल के घर विषधर बन आये क्यो।
"नबी" के ये व्यंग चित्र तूने हैं बनाये क्यों।
।
नबी तो इबदतो की आन-बान-शान हैं।
खुदा की खुदाई हैं कुरान की जबान हैं।
नबी किसी मजहबी झंडे का ना रंग हैं।
नभ मे स्वतंत्रता से उड़ती पतंग हैं।
महा-मानवो के व्यंग चित्र खीचकर।
तूलिका चलाई है क्यो आँख मीचकर।
किसने तुम्हे ये संस्कार दे दिए।
चित्र बांचने के अधिकार दे दिए।
।
विष-बीज बोया है तो विष मिल पायेगा।
नाग-फनी पे गुलाब कैसे खिल पायेगा।
ठीक परिणाम नही नफरती जूनून के।
कंटकों के पथ प्यासे हैं सदा से खून के।
देखो जरा अपने गरेबाओ मे झाँक कर।
पांप घट छलकेगा बैठे रहो ढांक कर।
थूकोगे जो तुम ध्रष्टता से आसमान पर।
गिरेगा वो थूक खुद अपने ही मान पर।
।
बामियानी बुद्ध से यूं क्रुद्ध-युद्ध ठानकर।
तालिबानियों ने तोडी प्रतिमा थी जानकार।
वो भी आस्थाओ-भावनाओं की प्रतीक थी।
अधरों से मौन पर अंतस की चीख थी।
अनुचितता का दंभ भरें छाती तान कर।
बैठे साहूकार बने मजहबी दूकान पर।
उनको ना वास्ता पैगम्बर ओ कुरान से।
आयतों नमाज से ना मजहबी इमान से।
।
कर दिया मान भंग तूने इस्लाम का।
कैसे नग्न चित्र खीचा भारती के नाम का।
भाषा मे कुरान की ये घटना सही है क्या?
भारत का खून तेरी रग मे नही है क्या?
चित्र रचा जिससे कलम शर्मिंदा है।
पूछता हूँ मैं सवाल क्यो हुसैन जिंदा है?
सच्चे मुसलमान हो तो जाओ उसे मार दो।
छाती मे हुसैन की लो खंज़र उतार दो।
।
मेरठ के वरिष्ठ नेता जनाब याकूब कुरैशी ने कहा "जो मुहम्मद साहब के कार्टून को बनाने वाले चित्रकार का सर लाकर देगा उसे वो पचास करोड़ रुपये का इनाम देंगे। इसपर कवि की कलम ने लिखा:
।
याकूब जी होता नाज़ तुमपे सारे देश को।
व्यापकता देते गर मजहबी सन्देश को।
भावनाओं को ना कोई मोल-तोल चाहिऐ।
रिश्ते की मिठास को दो मीठे बोल चाहिऐ।
वोटो के जुगाड़ मे ना सस्ता काम कीजिए।
आबरू-ए-हिंद को ना यूं नीलाम कीजिए।
होती ना शिकायत हमे जातिवादी कोढ़ की।
बोलते हुसैन पे भी बोली कुछ करोड़ की।
।
सार मेरे यार मेरे गीत का है इतना।
जातियों के नाम पर लडो चाहे जितना।
पथ है जटिल दोनों पाँव लड़खेंगे ही।
बर्तन संग-संग हैं तो खडकेंगे ही।
पर मजहबी पंजो से ना इसे नोचिये।
मौन खडा कहता क्या तिरंगा जरा सोचिये।
केसरिया-हरा दोनों ध्वज मे समान हैं।
यूं तो बस रंग हैं मिले तो हिन्दुस्तान है।
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यदि हम मुहोम्मद साहब के कार्टून बनाने पर विरोध कर सकते हैं तो क्या हमे माँ भारती के नग्न चित्र बनाने का विरोध नही करना चाहिऐ? जो लोग इन दोनों घटनाओ को अलग-अलग नज़रों से देखते हैं उनके लिए मैंने ये कविता लिखी-
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फिर क्यो फिजा मे विषधारी महावात है।
बुझे-बुझे हैं चिराग अंधियारी रात है।
आंखो का ये श्याम रंग ज्वाल लाल हो गया।
भ्रकुटियाँ तनी काल विकराल हो गया।
शांत जलधि मे जैसे ज्वार आ गया।
काले घन आये अन्धकार छा गया।
कोकिल के घर विषधर बन आये क्यो।
"नबी" के ये व्यंग चित्र तूने हैं बनाये क्यों।
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नबी तो इबदतो की आन-बान-शान हैं।
खुदा की खुदाई हैं कुरान की जबान हैं।
नबी किसी मजहबी झंडे का ना रंग हैं।
नभ मे स्वतंत्रता से उड़ती पतंग हैं।
महा-मानवो के व्यंग चित्र खीचकर।
तूलिका चलाई है क्यो आँख मीचकर।
किसने तुम्हे ये संस्कार दे दिए।
चित्र बांचने के अधिकार दे दिए।
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विष-बीज बोया है तो विष मिल पायेगा।
नाग-फनी पे गुलाब कैसे खिल पायेगा।
ठीक परिणाम नही नफरती जूनून के।
कंटकों के पथ प्यासे हैं सदा से खून के।
देखो जरा अपने गरेबाओ मे झाँक कर।
पांप घट छलकेगा बैठे रहो ढांक कर।
थूकोगे जो तुम ध्रष्टता से आसमान पर।
गिरेगा वो थूक खुद अपने ही मान पर।
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बामियानी बुद्ध से यूं क्रुद्ध-युद्ध ठानकर।
तालिबानियों ने तोडी प्रतिमा थी जानकार।
वो भी आस्थाओ-भावनाओं की प्रतीक थी।
अधरों से मौन पर अंतस की चीख थी।
अनुचितता का दंभ भरें छाती तान कर।
बैठे साहूकार बने मजहबी दूकान पर।
उनको ना वास्ता पैगम्बर ओ कुरान से।
आयतों नमाज से ना मजहबी इमान से।
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कर दिया मान भंग तूने इस्लाम का।
कैसे नग्न चित्र खीचा भारती के नाम का।
भाषा मे कुरान की ये घटना सही है क्या?
भारत का खून तेरी रग मे नही है क्या?
चित्र रचा जिससे कलम शर्मिंदा है।
पूछता हूँ मैं सवाल क्यो हुसैन जिंदा है?
सच्चे मुसलमान हो तो जाओ उसे मार दो।
छाती मे हुसैन की लो खंज़र उतार दो।
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मेरठ के वरिष्ठ नेता जनाब याकूब कुरैशी ने कहा "जो मुहम्मद साहब के कार्टून को बनाने वाले चित्रकार का सर लाकर देगा उसे वो पचास करोड़ रुपये का इनाम देंगे। इसपर कवि की कलम ने लिखा:
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याकूब जी होता नाज़ तुमपे सारे देश को।
व्यापकता देते गर मजहबी सन्देश को।
भावनाओं को ना कोई मोल-तोल चाहिऐ।
रिश्ते की मिठास को दो मीठे बोल चाहिऐ।
वोटो के जुगाड़ मे ना सस्ता काम कीजिए।
आबरू-ए-हिंद को ना यूं नीलाम कीजिए।
होती ना शिकायत हमे जातिवादी कोढ़ की।
बोलते हुसैन पे भी बोली कुछ करोड़ की।
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सार मेरे यार मेरे गीत का है इतना।
जातियों के नाम पर लडो चाहे जितना।
पथ है जटिल दोनों पाँव लड़खेंगे ही।
बर्तन संग-संग हैं तो खडकेंगे ही।
पर मजहबी पंजो से ना इसे नोचिये।
मौन खडा कहता क्या तिरंगा जरा सोचिये।
केसरिया-हरा दोनों ध्वज मे समान हैं।
यूं तो बस रंग हैं मिले तो हिन्दुस्तान है।